Friday, August 29, 2008

बचपन


कल रात देखा तारों को,
टिमटिमाते झिलमिलाते सितारों को,
चाँद अपनी चांदनी बिखेर रहा था,
मुझे फिर बचपन मे धकेल रहा था।

बचपन,
जब मैं भी इनकी तरह आजाद था,
जब कोई बोझ मेरे कंधो पर था,
आजाद था मैं माँ-बाप की आशाओं से,
आजाद था मैं कुछ करके दिखने के दबाव से,
दूर था इस छल भरी कपटी दुनिया से,
खुश था अपनी छोटी-सी निश्छल दुनिया में।

दुनिया,
जहाँ बैट था ,थी बॉल और चाकलेट ,
कॉमिक्स और गेमिंग थी,
और थे मेरी तरह दुसरे नन्हे साथी।
दिन-भर खेलते,उछलते-कूदते,
रात को फिर मिलते चंदा मामा से,
बातें करते तारों से,
और फिर जी-भर सोते।

मस्त दुनिया थी वो,
पर अब कही खो गई वो,
खो गया मेरा वो जहाँ,
जिसे आज भी मैं धुन्ड़ता हूँ इन तारों में,
चमकते चाँद और झिलमिलाते सितारों में

2 comments:

Unknown said...

U still have your BACHPAN with uuu.....jst search it out..................gud 1 man

Mera BACHPAN

RAHUL said...

sexy poem !

nice imagination blending innocence.