Tuesday, November 4, 2008

कैसे कोई इतना अपना हो जाता है

कैसे कोई इतना अपना हो जाता है,
की अपना हर सपना उनके नाम हो जाता है,
सूर्य के तेज से नही हो,
उनकी आँखों की चमक से होती है हर सुबह,
उनके मासूम चेहरे में पूरा दिन ढल जाता है,
कैसे कोई इतना अपना हो जाता है

वो जो बात कर ले तो पूरा दिन बन जाता है,
वो जो नजर फेर ले तो दर्द ही दर्द रह जाता है,
कैसे कोई इतना अपना हो जाता है

वो जो उलझन में हो तो हम उसे अपना मान लेते हैं,
उसकी उलझन को दूर करते हैं, फ़िर ख़ुद चाहे लाख मुसीबते झेलते हैं,
उनकी खुशी से इन मुसीबतों में भी हर्ष फैल जाता है,
कैसे कोई इतना अपना हो जाता है

कैसे कोई इतना अपना हो जाता है,
कि वो शख्श ही अपनी जिंदगी बन जाता है,
कैसे कोई इतना अपना हो जाता है,
की दिल बार-बार उनको ही पुकारता है,
कैसे कोई इतना अपना हो जाता है,
कि जीना और मरना भी उन पर निर्भर हो जाता है,
कैसे कोई इतना अपना हो जाता है,
कि रूह के हर अंश में भी उसका नाम समां जाता है,
कैसे कोई इतना अपना हो जाता है

ख्वाहिश दिल की

" दिन में खुश हैं, रात में,
हम तो खुश हैं,
बस उनसे हुई उस दो पल की मुलाकात में"

दिल के एक कोने में अब भी वो कसक बाकी है ,
तुझको देखने की एक आखिरी ललक बाकी है
पाने को तो सब कुछ पा लिया है जिंदगी में,
बस तेरी एक प्यार भरी झलक बाकी है

सुनने को तो सुना है मोजार्ट का म्यूजिक भी,
पर तेरे घुंघरू की खनक सुनने की चाह अभी बाकी है
यु तो चला हूँ जिंदगी की हर राह पर,
पर तेरे मेरे प्यार की राह पर चलना अभी बाकी है,
मरते मरते गुजारी है पूरी ज़िन्दगी ,
तुम्हारे साथ चैन के दो पल बिताना अभी बाकी है।