Friday, May 22, 2009

दुविधा

राह नही है आगे,
पीछे हम जा नही सकते,
मिले थे उनसे कभी,
ये हम भुला नही सकते।

सुकून की तलाश में आगे बढे थे,
पर वो तो था वही उनके साथ,
यह अब उन्हें बता नहीं सकते।

बैठे हैं यही दुविधा में,
और समय है की,
वो भी रुक सा गया है,
ठहर गया है सब कुछ,
कोई सहारा भी नज़र नही आ रहा है।

पीछे देखा तो ,
एक यादों की कश्ती आखों के आगे से गुज़र गई,
पता ही नही चला हमे,
के कब ये आंसुओ से भर गई,
ये आसूं भी खास हैं,
दुःख और खुशी,
दोनों में आते हैं,
अजीब सी बात है ये,
के दर्द और मलहम ,
दोनों ही ये आंसू बन जाते हैं।

आगे देखा तो,
कई विचार दिमाग में कोंध गए,
मैं देख उसे सोचता रह यही,
के अब करू तो क्या करू मैं,
और इसी सोच में,
सोच से ज्यादा पल,
उसी सोच में गुज़र गए।

एहसास हुआ जब इसका तो,
काफी देर हो चुकी थी,
जब तक कुछ समझ पता मैं,
ज़िन्दगी गुज़र चुकी थी


पर इतना सोच कर यही समझा मैं,
के ज़िन्दगी कहते ही इसे हैं,
जिसमे आप होते हैं, एक राह होती है,
और एक दुविधा होती है,
समझा मैं बस इतना ही,
ज़िन्दगी एक सफर है,
जो कभी पुरा नही होता,
जिसमे मंजिल सफर करने से पहले ही,
है आपके पास होती,
पर फ़िर भी आप सफर करते हैं,
और आपकी मंजिल,
फ़िर कभी आपके पास नही होती।

1 comment:

रोहित said...

मैं तो आवारा को ढूंढने निकला था। पर आप तो कवि निकले।