सांसे रहत की न मिली,
मिली है तूफानो भरी ज़िन्दगी,
ख़ुशी दो पल की न मिली,
मिली है लम्बी दुखो की घडी।
आजाद जीने की तमन्ना थी,
पर कई बंधन आकर बंद गए,
बेधड़क बहने की तमन्ना थी,
पर ज़िन्दगी ने कई ठहराव दिए।
चलते हुए जलती रेत मे,
पेर हमेशा धसते ही गए,
हम उठे है हर बार गिर के,
पर और गहरे गिरते ही गए,
मगर हारे अब भी नहीं है हम,
क्योंकि मुकाबले का अंजाम हमे पता है,
विश्वास खुद पे है इतना,
की सितम ढहाते ढहाते थक जायेगी ज़िन्दगी,
कहेगी,
"जीते तुम और जो हारी वो मैं हूँ"---ज़िन्दगी।
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