Friday, January 30, 2009

दरखास्त

रहम न कर, मुझ पे मालिक रहम न कर,
मुझ पे ए बिन मौसम, प्यार की बरसात न कर,
न दे मुझको सजा से आज़ादी,
वरना इस बार फैलाऊंगा बरबादी,
और तू सोचेगा,
क्यों इसे और कड़ी सजा दी।

तन्हाई की बंजर ज़मीन पे मुझे जीने दे,
गुनाहगार हूँ मैं मुझे ऐसे ही रहने दे,
प्यार के बीज बोने की कोशिश पहले मैंने भी की थी,
पर तब तुने ही तो उस गुनाह की सजा मुझे दी,
तुने ही तो मिलन की बरसात रोक दी,
और लगा के जुदाई की आग मेरे जीवन में ,
मुझे तन्हाई की बंजर ज़मीन दी।

अब जब मैंने सब अपना लिया है,
हो गया हूँ आदि इन कंटीली राहों का,
तो तू फ़िर मुझे सता रहा है,
दिखा के मुझे तू फ़िर नए सपने,
मुझे पता है तू मुझे भरमा रहा है,
क्योकि यह बरखा भी दो दिन की होगी,
और फ़िर तन्हाई की लम्बी ज़िन्दगी होगी।

तो इस बरखा का रहम मुझे नही चाहिए,
पर मुझ पर एक मेहरबानी कर दे,
अब आगे मुझे पर ऐसी मेहरबानी और न कर के,
मुझे अपना कद्रदान कर ले,
वरना इस बार और न सह पाउँगा,
बनुगा दरिंदा और दुसरो की हरी भरी ज़िन्दगी में तबाही फैलाऊंगा।

तो तेरे उन दुसरे बन्दों के लिए ही सही,
यह एहसान मुझ पर कर दे,
जीने दे मुझे ऐसे ही,
मेरी जिंदगी बदलने की कोशिश बंद कर दे।

1 comment:

Butterflieslove said...

rahem kar mujhe pe ankur kuch to rahem kar...........insano ko samjh aae aisi kavita kar.....hahahahhahah